महाभारत की रोचक कहानियाँ ! Amazing Secret Story of Mahabharata.



दोस्तों जैसा की हम जानते हैं की भगवत गीता के उपदेश सबसे बड़े धर्मयुद्ध महाभारत की रणभूमि कुरुक्षेत्र के युद्ध में अपने शिष्य अर्जुन को भगवान् श्रीकृष्ण ने दिए थे जिसे हम गीता सार – Geeta Saar भी कहते हैं। आज 5 हजार साल से भी ज्यादा वक्त बित गया हैं लेकिन गीता के उपदेश आज भी हमारे जीवन में उतने ही प्रासंगिक हैं । लेकिन दोस्तों आज हम आपके साथ Share करने जा रहें हैं “महाभारत की रोचक कहानियाँ ( Amazing Secret Story of Mahabharata )” जो आपने पहले शायद ही सुनी होंगी । 



महाभारत के युद्ध के समय कैसे बनता था खाना :-

राजा udupi ने महाभारत के युद्ध में दोनों पक्ष का साथ देने से मना कर दिया ।  उन्होंने कहा हम युद्ध में हिस्सा नहीं लेंगे लेकिन  हम दोनों पक्षों को भोजन देंगे, और आपको जानकार हैरानी होगी की महाभारत के पुरे युद्ध में कभी भी भोजन कम नहीं पड़ा ।  राजा उडुपी  ने बताया की उन्हें कृष्णा ( Krishna )  के खाना खाने से पता चल जाता था की कल युद्ध में कितने सैनिक मरेंगे  और उसके हिसाब से अगले दिन का खाना बनता था । 

 

कृष्णा की मोहिनी के रूप में Erawn ( अर्जुन का पुत्र ) से शादी :-

अर्जुन का अभिमन्यु के अलावा एक पुत्र और था  जो अर्जुन और उलूपी की संतान था ।  जिसका नाम था Erawn । Erawn ने अपने पिता की जीत के लिए अपनी बलि देने की प्रतिज्ञा की, पर वह बलि से पहले शादी करना चाहता था । कोई भी अपनी कन्या की शादी ऐसे युवक से नहीं करना चाहता था जो शादी के बाद ही मर जाये । जब कोई भी Erawn से शादी के लिए तैयार नहीं हुआ तो भगवन कृष्ण ने मोहिनी रूप रखा और Erawn से शादी की ।

 

मृत्यु के समय कर्ण की दानवीरता :-

कर्ण  महान दानवीर था । कर्ण जब युद्ध भूमि में अंतिम साँस ले  रहा था तो कर्ण की दानवीरता की परीक्षा लेने के लिए भगवान Krishna ने बूढ़े का बेष बनाया और कर्ण के पास गए और कर्ण को दान देने को कहा । कर्ण ने कहा की बताओ आप को क्या चाहिए दान में । बुड्ढे बेष दरी कृष्ण ने कहा मुझे सोना दो ।

कर्ण का दन्त सोने का था । उसने बूढ़े से खा आप मेरा दन्त निकल लो । बुड्ढे ने ऐसा करने से मना कर दिया । तो कर्ण ने खुद ही पत्थर से अपना दन्त तोड़कर से दे दिया । बुड्ढे ने कहा में खून सना दन्त नहीं ले सकता । तो कर्ण तीर चलकर बारिश की और दन्त साफ करके बुड्ढे को दे दिया ।
इससे कर्ण की दानवीरता का पता चलता है की मृत्यु के करीब होते हुए भी कर्ण ने दानवीरता का परिचय दिया ।

 

राजा पाण्डु की अंतिम इच्छा :-

राजा पाण्डु ने अपने मरने से पहले अपनी अंतिम इच्छा कही की मेरे पुत्र मेरा सर ( Head ) खा लें । जिससे मेरा ज्ञान उनका हो जाएगा । सहदेव ( Sehdev )  ने उनके सर के ३ हिस्से खाये । जिससे पहले हिस्से को कहते ही उन्हें भुत ( Past ) का दूसरे को खाते ही वर्तमान ( Present )  का और तीसरे को कहते ही भबिष्य ( Future ) का ज्ञान हो गया ।

 

असत्य पर सत्य की जीत :-

जब दुर्योधन भीम के द्वारा हरा दिया गया और वह अपनी अंतिम साँस ले रहा था । तो कृष्ण दुर्योधन  के पास आये । दुर्योधन  ने ऊँगली उठकर इशारा किया  । भगवन कृष्ण समझ गए दुर्योधन  कहना चाह रहा है की वो एक गलती नहीं करता तो आज युद्ध  जीत जाता ।  कृष्ण ने कहा तुम कुछ भी कर लेते फिर भी नहीं जीत पाते । अधर्म कितना भी फलता फूलता नज़र आये पर अनन्त में जीत सत्य की ही  होती है ।

 

द्रोपदी  का स्वयंवर :-

राजा द्रुपद की यह लालसा थी की उनकी पुत्री का विवाह किसी न किसी प्रकार Arjun  से हो जाये , परंतु उन्होंने यह विचार किसी के सामने प्रकट नहीं किया । Arjun को पहचानने के लिए उन्होंने एक ऐसा धनुष बनवाया जो किसी दूसरे से झुक न सके । इसके अतरिक्त आकाश में एक ऐसा यन्त्र बनवाया जो चक्कर काटता रहता था । उसी के के ऊपर वेधने का लक्ष्य रखवाकर यह घोषणा करा दी की जो वीर इस धनुष पर डोरी चढ़ाकर इस घूमते हुए यन्त्र के अंदर रखी मछली की आंख भेद देगा उसी के साथ में अपनी पुत्री का विवाह कर दूंगा ।

सब और चारदीवारी थी उसके भीतर रंगमंडप के चारो तरफ उचे और स्वेत रंग के गगन चुम्बी महल बने हुए थे । विचित्र चंदोवे से उस सभा बाहवां को सब तरफ से सजाया गया । फर्श और दीवारों पर मणि और रत्न जेड थे ।

उत्सव के १६ वे दिन ऋषि मुनि , देश – देश के राजा , राजकुमार , ब्राह्मण से सभामंडल खचाखच भर गया । करवो के षणयंत्र के कारण पांडव भी ब्राह्मण के भेष में मंडली में आकर बैठ गया ।

द्रोपदी अपनी प्रमुख सखियो के साथ सुन्दर वस्त्र और आभूषण से सज धज कर हाथ में सोने की वरमाला लेकर रंगमंडल में आकर खड़ी हो गयी ।

हर कोई अपने बल से द्रोपदी को वरने के लिए तैयार थे । बहुत से लोग धनुष उठाने के प्रयास में ही गिर गए । कुछ से धनुष उठा तो पर उसपर डोरी भी नहीं चढ़ा पाए । धीरे धीरे जगज जगह से आये वीर का उत्साह ख़तम हो गया और सब नतमस्तक होकर सभी बैठ गए । सबको उदास देखकर कर्ण ने आकर धनुष की डोरी जैसे ही चढ़ाई । तभी द्रोपदी बोल पढ़ी में सूतपुत्र को नहीं बरूंगी । उसी समय अर्जुन खड़े हो गए  सभी आश्चर्य से अर्जुन को देखने लगे । सब सोचने लगे बढे बढे राजा लक्ष्य नही भेद सके तो यह ब्राह्मण कैसे लक्ष्य को भेद पायेगा ।

कही यह ब्राह्मण का अपमान न करा दे तभी अर्जुन धनुष के पास पहुच गए अर्जुन ने बहुत आराम से धनुष पर डोरी चढ़ाकर लक्ष्य भेद दिया । चारो तरफ महान आन्नद कोलाहल हो गया । द्रोपदी ने अर्जुन के गले में वरमाला डाल दी और इस तरह द्रोपदी का विवाह अर्जुन से हो गया ।



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Post Author: sudhir singhmar

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